ये बात है भारत की आजादी के 5 साल बाद यानी साल 1952 की जब जिला मुख्यालय रुद्रप्रयाग से केदारघाटी को यातायात सुविधा से जोड़ने के लिए संगम बाजार में सुरंग का निर्माण किया गया था। यह सुरंग रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे पर स्थित है और उस समय केदारघाटी को सड़क मार्ग से जोड़ने वाला यही एकमात्र रास्ता था। इस सुरंग से प्रतिवर्ष हजारों वाहनों के साथ ही लाखों भक्त भी आवाजाही करते हैं, जिससे सुरंग के अंदर हर समय खतरा बना रहता है, 68 मीटर लंबी सुरंग की आधी से अधिक लाइनिंग जहां पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है।  सुरंग की लाइनिंग के 4 ब्लॉक तीन माह पहले ही ढह चुके हैं, जबकि अन्य कई ब्लॉक अपनी जगह छोड़े हुए हैं। यात्रा सीजन में वाहनों का दबाव बढ़ने से समस्या और भी ज्यादा जटिल हो जाती है। केदारनाथ धाम के लिए यहीं से वाहनों का संचालन होता है। खास बात यह है कि सुरंग के अंदर बिजली की कोई व्यवस्था भी नहीं है।

रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे पर बनी यह सुरंग अब जर्जर स्थिति में आ चुकी है। सुरंग के ऊपरी सतह पर लगी सीमेंट की ईंटें लगातार नीचे गिरने लगी है। वर्ष 2012 एवं 2017 में भी यह सुरंग क्षतिग्रस्त हुई थी, जिसे अस्थाई तौर पर लीपापोती कर ठीक किया गया। विभाग ने सुरंग की मरम्मत के लिए कोई ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की। लिहाजा सुरंग खोखली होने से उसके अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। साल 2012 में पहली बार सुरंग के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराने शुरू हुए थे तब लगभग 50 मीटर लंबी सुरंग के एक छोर के ऊपर हिस्सा खोखला होने से ऊपरी सतह पर लगी ईंटें बाहर निकल कर नीचे गिरनी शुरू हो गई थी, जिससे लगभग आधा मीटर हिस्सा खोखला हो गया था।

इसके बाद तत्कालीन निर्माणदायी संस्था बीआरओ ने जैसे-तैसे कर खोखले स्थान पर सीमेंट भरकर अस्थाई तौर पर ठीक तो कर दिया था, लेकिन स्थाई समाधान नहीं हो खोजा गया था। मार्च 2017 में एक बार फिर सुरंग में लगी ईंटें नीचे गिरने लगी। इसके बाद इस समस्या को देखते हुए लोनिवि एनएच ने यहां पर एक साइन बोर्ड लगाकर खोखले स्थान की सभी ईंटें व मलबे को यहां से साफ कर दिया था। अस्थाई तौर पर सुरंग में लोहे के गार्डर लगाकर ठीक किया था। लेकिन फिर भी इसका स्थाई समाधान नहीं हो सका। एक बार फिर से सुरंग के ऊपर सतह पर लगी ईंटें नीचे गिरने शुरू हो गई हैं, जिससे कभी  भी कोई बड़ी अनहोनी हो सकती है।

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