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जन्मदिन विशेष: तीलू रौतेली “गढ़वाल की लक्ष्मीबाई”, सात युद्ध लड़ने वाली विश्व की एक मात्र वीरांगना

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पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट में गोर्ला रौत थोकदार और गढ़वाल रियासत के राजा फतेहशाह के सेनापति भूप्पू रावत की बेटी थी तीलू। तीलू का जन्म साल 1661 में हुआ था। तीलू के दो बड़े भाई थे पत्वा और भक्तू। तीलू की सगाई बाल्यकाल में ही ईड़ गांव के सिपाही नेगी भवानी सिंह के साथ कर दी गई थी। बेला और देवकी की शादी तीलू के गांव गुराड में हुई थी, यह दोनों तीलू की हमउम्र थी। गढ़वाल में पति की बड़ी बहिन को ‘रौतेली’ नाम से संबोधित किया जाता है। बेला और देवकी भी तीलू को ‘तीलू रौतेली’ कहकर बुलाती थी। वीर भाईओं की छोटी बहिन तीलू बचपन से तलवार-ढाल के साथ खेलकर बड़ी हो रही थी।

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बचपन में ही तीलू ने अपने लिए सबसे सुंदर घोड़ी ‘बिंदुली’ का चयन कर लिया था। 15 वर्ष की होते-होते गुरु शिबू पोखरियाल ने तीलू को घुड़सवारी और तलवारबाजी के सारे गुर सिखा दिए थे। जब भी गढ़वाल में फसल काटी जाती थी वैसे ही कुमाऊं से कत्यूर सैनिक लूटपाट करने आ जाते थे। फसल के साथ-साथ ये अन्य सामान और बकरियां तक उठाकर ले जाते थे। नियति के क्रूर हाथों ने तीलू के पिता, मंगेतर और दोनों भाइयों को युद्ध भूमि में मौत की नींद सुला दिया था। तीलू की मां मैणा देवी को बहुत दुख हुआ और उन्होंने  तीलू को आदेश दिया कि वह नई सेना गठित करके कत्यूरों पर चढ़ाई करे। प्रतिशोध की ज्वाला ने तीलू को घायल सिंहनी बना दिया था। दृढ़ संकल्प के साथ उसने कुमाऊँ के कत्यूरियों के विनाश की रणभेरी बजा दी। जिसके बाद तीलू ने अपनी सेना तैयार की और अपनी घोड़ी बिन्दुली और बचपन की दो सहेलियों बेल्लू और देवली को साथ लेकर उसने शत्रु विनाश के संकल्प के साथ युद्ध के लिए कूच किया।

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लगातार 7 वर्षों तक बड़ी चतुराई से तीलू ने रणनीति बनाकर कत्यूरों का सर्वनाश कर दिया। बेला और देवकी ने भी तीलू के साथ लड़ाई लड़ी। कुमाऊं में जहां बेला शहीद हुई उस स्थान का नाम बेलाघाट और देवकी के शहीद स्थल को देघाट कहते हैं। अंत में जब तीलू लड़ाई जीतकर अपने गांव गुराड वापस आ रही थी तो रात को पूर्वी नयार में स्नान करते समय कत्यूर सैनिक रामू रजवाड़ ने धोखे से उनकी हत्या कर दी। अपूर्व शौर्य, संकल्प और साहस की धनी वीरांगना, जिसे गढ़वाल के इतिहास में झांसी की रानी कहकर याद किया जाता है। 15 से 22 वर्ष की आयु के मध्य सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली, सम्भवतः विश्व की एकमात्र वीरांगना है, जिसने युद्ध यात्रा का यह कीर्तिमान स्थापित किया है। तीलू रौतेली की जयंती पर प्रदेश सरकार की ओर से उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को हर साल पुरस्कृत किया जाता है।

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