नाम: एस विजया

उम्र: 13 साल.

जगह: अनाईकोडु, तमिलनाडु

मौत की वजह: पीरियड होना

आप सोच रहे होंगे, कि पीरियड होना तो एक मामूली सी चीज़ है. हर लड़की को होता है. इसमें मरने जैसी खतरनाक हालत कैसे हो गई?

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तमिलनाडु में हाल में ही साइक्लोन गाजा आया था. उसकी वजह से तेज हवाएं, बारिश, तूफ़ान जैसे हालात हो गए थे. साइक्लोन के आने के समय ही सेल्वाराज की बेटी विजया के पीरियड चल रहे थे. तमिलनाडु के कई हिस्सों में ये प्रचलन है कि वहां पीरियड्स आने पर औरतें घर के बाहर झोपड़ियों में चली जाती हैं. शहरों में जहां ये करना संभव नहीं होता, वहां वो घर के एक कोने में जाकर बैठ जाती हैं.जब विजया झोपड़ी में थी, तब उस झोपड़ी पर नारियल का एक पेड़ गिर गया था. शायद विजया चीखी चिल्लाई भी होगी. लेकिन साइक्लोन गाजा ने उसकी चीखों को घर के अन्दर उसके मां बाप तक पहुंचने नहीं दिया.

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17 नवम्बर की सुबह उसके शरीर को पेड़ के नीचे से मुश्किल से निकाला गया. उसके पिता ने रोते रोते बताया कि वो तो सिर्फ परंपरा का पालन कर रहे थे. विजया ‘बड़ी’ हो गई थी, इसलिए उसका अलग झोपड़ी में रहना ज़रूरी था (पीरियड के समय).गीता इलोंगोवन एक डाक्यूमेंट्री फिल्ममेकर हैं जिन्होंने द वायर से बात की. अपनी इस बातचीत में उन्होंने बताया कि कहीं कहीं पर सिर्फ पहले पीरियड के समय ही अलग रहना पड़ता है लड़कियों को. कहीं-कहीं पर ये हर महीने होता है. इन झोपड़ियों में टॉयलेट की सुविधा नहीं होती, घर से दूर जाना होता है. इस्तेमाल के बर्तन पास के पेड़ पर टांग दिए जाते हैं. घर की हर औरत के लिए अलग बर्तन होते हैं.

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इस तरह की प्रथा का पालन नेपाल के उत्तरी हिस्से में भी होता है. इसे छाउपड़ी कहा जाता है. इसकी वजह से वहां हो रही मौतों ने सरकार का और एक्टिविस्ट्स का ध्यान खींचा. इसके बाद इसको लेकर काफी लम्बी बहस चली और इस साल आखिरकार वहां ये प्रथा बैन कर दी गई. लेकिन क्या कानून इस समस्या का हल दे सकता है?
गीता ने बताया कि जब उन्होंने अपनी डॉक्यूमेंट्री के लिए लड़कियों से बात की, एक दूसरा ही सच निकल कर सामने आया. कहने के लिए तो तमिलनाडु में पहली बार पीरियड होने पर लड़की को हल्दी से नहलाया जाता है. धूम-धाम होती है और पूरे समाज को पता चल जता है कि लड़की के पीरियड्स शुरू हो गए हैं. इसे कुछ लोग बहुत प्रोग्रेसिव मानते हैं. लेकिन जिन लड़कियों ने गीता से बात की उन्होंने बताया कि ये उन्हें बेहद अजीब और शर्मनाक लगता है कि सबको पता चल जाता है कि वो कब मेनस्ट्रुएट कर रही हैं. यही नहीं, अगर कोई लड़की पीरियड के तय समय पर झोपड़ी में ना जाए तो उसके बारे में बातें बनाई जाती हैं. फुसफुसाहट शुरू हो जाती है. कई तो पीरियड ना आने पर भी तय समय पर झोपड़ी में चली जाती हैं ताकि लोगों को सवाल उठाने का मौका न मिले.

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जो बात नेपाल में दिक्कत के तौर पर पेश आ रही है, वही दिक्कत यहां भी है. जो भी इसका विरोध करने की कोशिश करते हैं, उनको गांववाले या नजदीकी लोग परेशान करते हैं. उन्हें काम नहीं करने देते. इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व इतना बढ़ा चढ़ा दिया गया है कि औरतें खुद इस प्रथा से लड़ना नहीं चाहतीं. ये वही औरतें हैं जिनमें से कुछ सबरीमाला के सामने खड़ी होकर औरतों के अन्दर जाने का विरोध कर रही हैं. ऐसे लोग हमारे आस पास ही हैं. हम जानबूझकर उनसे आंखें फेर लें तो बात अलग है.

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