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दस आतंकियों को मारकर शहीद हुआ था सिपाही, अपने देश के सिस्टम से हारा परिवार, नहीं मिल रहा जायज हक

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उत्तराखंड के वीर बहादुर सिपाहियों का लोहा पूरी दुनियां मानती है, और जब बात भारत के बॉर्डर की हो और जैसे ही आतंकियों को पता चलता है उत्तराखंड के वीर सिपाही बोर्डर की रक्षा में तैनात हैं उनके आधे प्राण तो वैसे ही निकल जाते हैं। ऐसे ही एक वीर और महान योद्धा के बारे में आज हम आपको यहाँ बता रहे हैं, लालकुआं के बिंदुखत्ता के रहने वाले मोहन नाथ गोस्वामी साल 2002 में नौ पैरा में भर्ती हुए थे। अपनी बहादुरी के दम पर उन्होंने बहुत जल्दी ही सेना में एक अच्छा मुकाम हासिल कर दिया था और उनकी पहचान एक खतरनाक कमांडो के तौर पर पूरे भारत में हो गयी थी बात साल 2015 की है जब मोहन नाथ गोस्वामी जम्मू-कश्मीर के विशेष बल पैरा कमांडो में शामिल थे। उसी दौरान 23 अगस्त 2015 को जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के सफाए के लिए विशेष अभियान चलाया गया था इसमें तीन आतंकी मारे गये थे उसके बाद मोहन ने बॉर्डर से सटे जंगल में साथियों की मदद से तीन और आतंकियों को मार गिराया और एक आतंकी को जिंदा भी पकड़कर लाये थे, पर इसी अभियान में मोहन नाथ गोस्वामी देश के लिए सीमा पर शहीद हो गये थे।

साल 2016 में केंद्र सरकार ने मरणोपरांत मोहन नाथ गोस्वामी को अशोक चक्र दिया था, गणतंत्र दिवस के अवसर पर पर मोहन की पत्नी भावना तथा बेटी भूमिका ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से ये पुरष्कार पाया था, इस पुरुष्कार में सम्मान के अलावा हर महीने 12 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी परिवार को दी जाती है। लेकिन अब लगभग 2 साल का समय हो गया है पर अभी तक भी उन्हें ये राशि हर महीने नहीं प्रदान की जा रही है, और शहीद के पत्नी पत्नी भावना सिस्टम के आगे हार गयी हैं क्यूंकि इस सम्बन्ध में वो कई बार बैंक और  सेना को पत्र भी लिख चुकी हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी अब जिला सैनिक कल्याण अधिकारी मेजर रौतेला तक पहुंची है इस पर उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा कि एसबीआइ बैंक प्रबंधन से संपर्क किया गया है और जल्द ही भावना को  उनका हक दिलाने के प्रयास किया जा रहा है। तो ये है हमारे देश का सिस्टम जहाँ एक महान शहीद के पत्नी को भी उसका जायज हक नहीं मिल रहा है आम आदमी की तो छोड़िए साहब उनकी तो को सुनता भी नहीं है।