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केदारघाटी के डमार गाँव में आज से दिव्य और भव्य पांडव नृत्य का आयोजन… आप भी चले आइये



रुद्रप्रयाग जिले में केदारघाटी के डमार गांव में पांडव लीला शुरू होने जा रही है। गांव में पारंपरिक रूप से आयोजित होने वाले पांडव नृत्य की अनेक विशिष्टताएं हैं। लोक मंगल की कामना से किए जाने वाले डमार गांव के पांडव नृत्य को इस घाटी में एक स्थापित मानक के रूप में भी गिना जाता है। आज यानी 28 नवम्बर से गाँव में पांडव नृत्य का आयोजन किया जाएगा और जो पूरे एक महीने तक जारी रहेगा और जिसका समापन 30 दिसम्बर को होगा।   पांडव नृत्य के दौरान महाभारत के सभी महत्वपूर्ण प्रसंगों का यहां लोकमंच में प्रस्तुतिकरण की भी पुरानी परंपरा है। चक्रव्यूह,कमलव्यूह, बिंदुव्यूह, गैंडा प्रसंगों का जीवंत अभिनय देखने लोग दूर दूर से गांव में आते रहे हैं। इन प्रसंगों के अभिनय और प्रस्तुतिकरण में गांव के कलावंतों की महारत मानी जाती रही है।

आपको बता दें सर्दियों के मौसम में केदारघाटी के ग्रामीण इलाकों में काफी चहल-पहल देखने को मिलती है। इसका कारण यहां होने वाले पांडव लीला का आयोजन है। जिसमें प्रवासी अपने गांवों की ओर लौटते हैं। ऐसे में यहां का माहौल काफी धार्मिक सा बन जाता है। इस दौरान खाली पड़े वीरान घरों में रौनक भी देखने को मिलती है। साथ ही गांव भी खुशहाल नजर आता है। पांडव लीला की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसका निर्वहन ग्रामीण आज भी कर रहे हैं। पांडव काल का स्कंद पुराण के केदारखंड में पूरा वर्णन मिलता है। इस पौराणिक एवं धार्मिक संस्कृति को महफूज़ रखने के लिए ग्रामीण आज भी पांडव लीला का आयोजन भव्य रूप से करते हैं। एक ओर जहां ग्रामीण अपनी अटूट आस्था के साथ संस्कृति को बचा रहे है, वहीं दूसरी ओर आने वाली पीढ़ी भी इससे रूबरू हो रही है।

मंदाकिनी नदी के  तट पर बसे खूबसूरत गाँव डमार में सालों से पांडव नृत्य का आयोजन होता आ रहा है।  नृत्य के आयोजन की अलग-अलग रीति रिवाज और पौराणिक परंपराएं होती हैं। जनश्रुतियों के अनुसार पांडवों ने केदारनाथ से स्वर्गारोहणी जाते समय गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर अपने अस्त्र-शस्त्रों को त्याग दिया था। इन्हीं शस्त्रों की पूजा अर्चना के बाद नृत्य की परंपरा आज भी कायम है। पाण्डव नृत्य कराने के पीछे गांव वालों द्वारा विभिन्न तर्क दिए जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से गांव में खुशहाली, अच्छी फसल के अतिरिक्त यह भी माना जाता है कि गाय में होने वाला खुरपा रोग पाण्डव नृत्य कराने के बाद ठीक हो जाता है। इस भव्य और वृहद् आयोजन के दौरान गढ़वाल में भौगोलिक दृष्टि से दूर दूर रहने वाली पहाड़ की बहू- बेटियां अपने मायके आती हैं, जिससे उनको वहाँ के लोगों को अपना सुख दुःख बताने का अवसर मिल जाता है। तो अगर आप भी केदारघाटी में आयोजित होने वाले पांडव नृत्य का दिव्य और भव्य आयोजन देखना चाहते हैं तो आप भी चले आइये और खुद को और अपने बच्चों को अपनी विरासत का अनूठी परम्पराओं से रुबुरु करिये।


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