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कोश्यारी के तबादले की तैयारी, तो क्या उत्तराखंड की साख पर भी बट्टा लगा गए भगत सिंह कोश्यारी?

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महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम में इतनी तेजी से चीजें सामने आयी कि हर कोई टीवी, सोशल मीडिया से चिपका हुआ यहाँ की गतिविधियों को जानने के लिए उत्सुक था। और अब जब बीजेपी के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के इस्तीफे के बाद चीजें अलग दिशा में चली गयी हैं। बीजेपी भले लाख दावा करे कि इस पूरे घटनाक्रम से उसका कोई लेना देना नहीं है और इससे उसकी साख पर कोई असर नहीं पड़ा है लेकिन ये बात पूरी तरह से सच नहीं है। आम जनता जो बीजेपी को पार्टी विद डिफ़रेंस के नाम से जानती थी उसे इस पूरे सियासी घटनाक्रम से धक्का जरुर लगा है।

आगे पता नहीं बीजेपी इस नुकसान की भरपाई कर पाएगी या नहीं पर इस नुकसान में जिस व्यक्ति की सबसे अहम भूमिका प्रतीत हो रही है उसमें देवेन्द्र फडनवीस के साथ राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की भी बहुत बड़ी भूमिका है। मीडिया में आ रही सूचना के अनुसार महाराष्ट्र में 23 नवंबर की सुबह करीब पौने छह बजे राष्ट्रपति शासन हटाया गया। इसके ठीक सवा दो घंटे बाद आठ बजे राज्यपाल ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस और उप मुख्यमंत्री अजीत पवार को शपथ दिलाई। सूत्र का कहना है कि यहां तक राज्यपाल ठीक हैं। उन्होंने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया।

यह नैतिक रूप से कहा जा सकता है कि राज्यपाल ने जल्दबाजी दिखाई और औपचारिकता तथा प्रोटोकाल को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया। आम तौर पर राज्यपाल को इस तरह की जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। राज्यपाल के इस कदम से उनके ऊपर भाजपा के एजेंट के तौर पर काम करने का भी एक बड़ा आरोप लगा है। अब इसके बाद अपनी छवि को पहुंचे नुकसान की भरपाई करने के कदम के तहत केंद्र सरकार द्वारा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का तबादला किए जाने की संभावना है।

सूत्रों के मुताबिक, राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र कोश्यारी की जगह ले सकते हैं। केंद्र सरकार में उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि मिश्र ने हिमाचल प्रदेश से स्थानांतरित किए जाने के बाद 9 सितंबर को राजस्थान के राज्यपाल का कार्यभार संभाला। भगत सिंह कोश्यारी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य के तौर पर सेवाएं दी हैं। कांग्रेस ने राज्यपाल कोश्यारी के संचालन के तरीके पर पर सवाल उठाया है। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, ‘सवाल यह नहीं है कि सच्चाई की जीत हुई है। आज बड़ा सवाल यह है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट उन तरीकों को देखे, जिसमें राज्यपाल ने सबसे अधिक पक्षपातपूर्ण तरीका अपनाया। उन्होंने संविधान, नियम, कानून, मिसाल और परंपराओं की बिल्कुल परवाह नहीं की।’

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